सुशासन की असल परीक्षा

सुशासन की असल परीक्षा

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सुशील कुमार सिंह

सुशासन की अवधारणा की रूपरेखा महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़े गए स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तैयार की गई थी। शोषणकारी, साम्राज्यवादी, आधुनिक उपनिवेशवादी शक्तियों से भारत के लोगों का सामना होने से उन्हें शासन के एक बेहतर स्वरूप को तलाशने का अवसर मिला था। आधुनिक भारत में यहीं से सुशासन की एक पटकथा सामने आई। सर्वोदय इसका सबसे बेहतर उदाहरण है जहां से सभी के उदय की संकल्पना और प्रतिबद्धता दिखाई देती है। जब तक समय के आईने में न देखा जाए, तब तक सुशासन का कोई भी सिद्धांत बोधगम्य नहीं हो सकता।

कोरोना के इस कालखंड के भीतर जनमानस की जम कर अग्नि परीक्षा हुई और हो रही है। गौरतलब है कि पूर्णबंदी के चलते अर्थव्यवस्था और रोजगार पर सबसे ज्यादा गाज गिरी। बीमारी, भुखमरी, शिक्षा और चिकित्सा से लेकर तमाम बुनियादी विकास के साथ सतत, समावेशी और साधारण विकास व समृद्धि के समस्त आयाम हाशिए पर चले गए। यह इस बात का प्रमाण है कि सुशासन एक नई परीक्षा से जूझ रहा है और सब कुछ पटरी पर लाने के लिए आगे कई वर्षों तक उसे योजनाबद्ध तरीके से जूझते रहना पड़ेगा। गौरतलब है कि सुशासन शांति और खुशियों को ही आगे बढ़ाता है। लेकिन कोरोना महामारी के चलते सुशासन कई झंझावातों में उलझ गया है। मौजूदा समय में इसकी वास्तविक उपलब्धि क्या है, इसका जवाब आसानी से नहीं मिलेगा। मगर दो टूक यह है कि इसका जवाब कोरोना से मुक्ति है।

देश में महामारी की दूसरी लहर पहली की तुलना में काफी तेजी से और ज्यादा घातक रूप में फैली। इससे शासन के हाथ-पांव तो फूले ही, स्वास्थ्य सुशासन भी हांफता नजर आया। महामारी ने एक बार फिर जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर डाला। करोड़ों लोगों को गरीबी में धकेल दिया। बंदी के चलते रोजगार से लोगों को हाथ धोना पड़ा, बचत खत्म हो गई और पाई-पाई के मोहताज हो रहे परिवारों को घर चलाने के लिए कर्ज लेने को मजबूर होना पड़ रहा है। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट बताती है कि कोरोना संकट की सबसे बड़ी मार गरीबों पर पड़ी है।

वैसे एक हकीकत यह भी है कि कई निम्न व मध्यवर्गीय आय वाले भी अब गरीबी की ओर जा चुके हैं। गौरतलब है कि 1.9 डॉलर से अधिक की रोजाना कमाई करने वाला गरीबी रेखा के ऊपर होता है। दस डॉलर तक की कमाई करने वाला निम्न आय वर्ग का समझा जाता है। जबकि इसके ऊपर मध्यम आय वर्ग है, लेकिन यह पचास डॉलर तक जाता है और पचास डॉलर से अधिक कमाने वाले उच्च आय वर्ग में गिने जाते हैं। मध्यम वर्ग में जो दस और बीस डालर के बीच हैं, उनकी हालत ज्यादा खराब है। वे या तो निम्न आय वर्ग की ओर जा रहे हैं गरीब हो रहे हैं।

प्यू रिसर्च सेंटर से तो यह भी पता चलता है कि साल 2011 से 2019 के बीच करीब छह करोड़ लोग मध्यम आय वर्ग में चले गए थे। करोना काल में तीन करोड़ लोग फिर से निम्न आय वर्ग में आ गए। जाहिर है, दस साल की कोशिश को एक साल के महामारी प्रकोप ने नष्ट कर दिया। यह भी सामने आया है कि मार्च से अक्तूबर, 2020 के बीच तेईस करोड़ गरीब मजदूरों की कमाई एक दिन की तय न्यूनतम मजदूरी भी नहीं हो पाती थी। इकतालीस करोड़ से अधिक श्रमिक देश में काम करते हैं, जिन पर कोरोना का सबसे ज्यादा असर पड़ा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि शहरों में गरीबी बीस फीसद और ग्रामीण इलाकों में पंद्रह फीसद बढ़ गई है।

दूसरी लहर को देखते हुए तमाम रेटिंग एजेंसियों ने भारत के विकास अनुमान भी घटा दिए हैं। गौरतलब है कि पिछले साल देशव्यापी बंदी के कारण बारह करोड़ से अधिक लोगों की नौकरी चली गई थी और बीस करोड़ लोगों का काम-धंधा बैठ गया था। वैसे एक हकीकत यह भी है कि कोरोना ने रोजगार की तुलना में छोटे-मोटे काम-धंधे कहीं ज्यादा चौपट किए हैं। छोटे और मझौले उद्योगों की हालत खराब हो गई। बड़ी संख्या में बंद ही हो गए। इसका नतीजा यह हुआ कि करोड़ों लोगों को घर बैठ जाना पड़ा। आय बंद हो गई।

इन सबका सीधा असर बैंक से लिए गए कर्ज पर भी पड़ा है। कमाई घटने के साथ बैंकों में मासिक किस्तें जमा करा पाना मुश्किल हो रहा है। आंकड़े बताते हैं कि बीते अप्रैल में आठ करोड़ चौवन लाख कर्जदारों में से करीब तीन करोड़ के चेक वापस लौट गए। जबकि मार्च में इसका प्रतिशत कम था। बीते एक साल में ऐसी स्थिति जून 2000 में भी आई थी जब पैंतालीस फीसद मासिक किस्तों के चेक लौटे थे। अभी यह स्थिति चौंतीस फीसद की है। ऐसे में बैंक अपने को एनपीए होने से कैसे रोक पाएंगे। आखिरकार आर्थिक सुशासन की भी यहां परीक्षा साफ-साफ दिखती है।

सुशासन लोक सशक्तिकरण का उदाहरण है। यह जनतंत्र के भीतर लोगों में असीम ताकत भरता है। जब तक अंतिम व्यक्ति तक विकास की बयार नहीं बहती, तब तक सुशासन बौना ही रहता है। जाहिर है, इससे निपटने के लिए सुशासन ही एक बेहतर उपाय है। देश के लोकतांत्रिक संविधान के अंतर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक को गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित किया गया है और यह सुशासन के जरिए ही संभव है। लोकतंत्र का सफल परीक्षण भी सुशासन की प्रयोगशाला में ही हो सकता है। महामारी के चलते लोगों ने जो पीड़ा भोगी है, वह कहीं न कहीं अच्छी सरकारों और उनके शासन पर बड़े सवाल खड़ी करती है।

सत्ता को यह समझने की आवश्यकता है कि लोकतंत्र से भरा जनमानस जब अपनी सरकार को कमजोर, असहाय और उसके लिए बहुत कुछ कर पाने में सफल नहीं देखता है तो उसके माथे पर चिंता की लकीरें उभरना लाजिमी हैं। दूसरी लहर ने जिन उनसठ फीसद छोटे उद्योगों को आर्थिक संकट में धकेला है, वे इस बात का इशारा करते हैं कि अभी जो बचे हैं, उन्हें भी यह संकट झेलने को तैयार रहना चाहिए। आठ फीसद छोटे कारोबारियों ने माना है कि उनके खाते खाली हो चुके हैं। उनचास फीसद कारोबारी जुलाई तक कर्मियों के वेतन में कटौती की योजना बना चुके हैं। इकतालीस प्रतिशत के पास केवल महीने भर के ही खर्च का पैसा मौजूद है।

समझने वाली बात यह भी है कि नागरिक सुशासन का मतलब आसान जीवन होता है। मगर जब वही जीवन शांति और खुशहाली की राह से भटक कर बदहाली के रास्ते पर हो तो वह सुशासन तो नहीं, हां कुशासन जरूर हो सकता है। सुशासन एक जन केंद्रित, लोक कल्याणकारी और संवेदनशील शासन व्यवस्था है जहां विधि के शासन की स्थापना के साथ-साथ संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों को प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। सुशासन का केंद्र नागरिक और उसका सशक्तिकरण है। सुशासन की प्राथमिकता गरीबी और भुखमरी से मुक्ति होती है।

महंगाई और सुशासन एक दूसरे के धुर विरोधी होते हैं। मगर वास्तविक स्थिति यह है कि आज खान-पान की वस्तुओं से लेकर डीजल, पेट्रोल और रसोई गैस का सिलेंडर की कीमतें आसमान छू रही हैं। अगर महंगाई और आमदनी के अनुपात में बहुत बड़ा अंतर आ जाए तो जीवन असंतुलित होने लगता है। मौजूदा समय में यही स्थिति है। महंगाई पर काबू पाना आर्थिक सुशासन का अच्छा उदाहरण है और महंगाई बढ़ाना कुशासन का। अब सरकार को यह समझना चाहिए कि जनता को क्या देना है। एक तरफ कोरोना से जूझती जनता है, दूसरी तरफ महंगाई, गरीबी, भुखमरी और बुनियादी समस्या के लिए दो-चार होते लोग। सुशासन के लिए यह कड़ी परीक्षा से कम नहीं है।

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