सीरिया का सत्ता संकट

सीरिया का सत्ता संकट

Spread the love

ब्रह्मदीप अलूने

लोकतांत्रिक देशों में सत्ता में असीमित शक्ति एक विवादास्पद संकल्पना रही है। बदलते दौर में आधुनिक राज्यों में सत्ता का वैधानिक और तार्किक रूप राजनीतिक नेतृत्व में केंद्रित करने के प्रयास बढ़े हैं। इसके प्रतिकूल प्रभाव राजनीतिक अस्थिरता के रूप में सामने आ रहे हैं और स्थापित व्यवस्थाएं ध्वस्त होकर मानवीय और राजनीतिक संकट को बढ़ा रही हैं। दरअसल गृह युद्ध से जूझते सीरिया में हुए आम चुनाव में बशर अल-असद ने अपनी सत्ता चौथी बार बरकरार रखी है। आम चुनाव में लोगों की भागीदारी, निष्पक्षता और विश्वसनीयता का संकट होने से इसे संपूर्ण क्षेत्र में शांति स्थापित होने की उम्मीदों के लिए गहरा आघात माना जा रहा है।

करीब एक दशक पहले सीरिया में राजनीतिक बदलाव के लिए उठे आंदोलन को बशर अल-असद की सरकार ने सख्ती से कुचल दिया था। इसके बाद से ही यह देश गृह युद्ध से जूझ रहा है। सीरिया के कई इलाकों पर विद्रोहियों का कब्जा है। कई देश अपने-अपने हितों को देखते हुए सीरिया के विभिन्न लड़ाकू गुटों को मदद दे रहे हैं। यहां पर शांति स्थापित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने सर्वमान्य सरकार की जरूरत को दोहराया है। लेकिन असद रूस, चीन और ईरान जैसे देशों की मदद से अपने को सत्ता में बनाए रखने में कामयाब हैं। इस स्थिति में मानवीय और राजनीतिक संकट से जूझ रहे इस देश में शांति और स्थिरता कायम करना चुनौती बनता जा रहा है।

दक्षिण पश्चिम एशियाई देश सीरिया की भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति उसकी समस्याओं को ज्यादा बढ़ा रही है। इसके पश्चिम में लेबनान और भूमध्य सागर, दक्षिण-पश्चिम में इजराइल, दक्षिण में जॉर्डन, पूर्व में इराक और उत्तर में तुर्की है। इजराइल और इराक के बीच स्थित होने के कारण इसकी स्थिति जटिल हो जाती है। कई प्राचीन सभ्यताएं भूमध्य सागरीय तटों के आसपास ही पनपी हैं, इसलिए यह क्षेत्र धार्मिक संघर्ष का प्रमुख केंद्र रहा है। इस्लामिक स्टेट (आइएस) का उभार इस क्षेत्र में इसीलिए हुआ था, ताकि ईसाई और उदार मुसलमानों को खत्म कर कट्टर इस्लामिक राज्य की स्थापना की जा सके। रोमन साम्राज्य के लिए भी भूमध्य सागर महत्त्वपूर्ण रहा है, इसलिए यूरोप का इस क्षेत्र में दखल बना रहता है।

सीरिया शिया-सुन्नी संघर्ष के केंद्र के रूप में भी कुख्यात है। बशर अल-असद शिया हैं और सीरिया की आबादी सुन्नी बाहुल्य है। सीरिया में सुन्नी समुदाय के लोगों की तादाद कुल आबादी का चौहत्तर प्रतिशत है, जबकि शिया करीब तेरह प्रतिशत हैं। अल्पसंख्यक शिया समुदाय से संबंधित असद का सुन्नी बहुल देश में सत्ता में बने रहना सऊदी अरब जैसी इस्लामिक ताकतों को रास नहीं आ रहा।

इसलिए वह सीरिया के विद्रोही संगठनों को सहायता देकर असद की सरकार को सत्ता को उखाड़ फेंकना देना चाहता है। वहीं शिया बहुल देश ईरान असद को सत्ता में बनाए रखने के लिए हथियारों की निर्बाध आपूर्ति सहित हर तरह से मदद करता रहा है। अमेरिका और फ्रांस जैसे देश भी असद के खिलाफ हैं और वे सीरिया के विद्रोहियों को मदद देते रहे हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। तुर्की के लिए सीरिया पारंपरिक गढ़ रहा है और वह सीरिया की राजनीति पर अपना अधिकार मजबूत रखना चाहता है। सीरिया से विस्थापित लोग तुर्की में ही सबसे पहले प्रवेश करते हैं और इस कारण तुर्की को भी मानवीय संकट से जूझना पड़ रहा है।

सीरिया में असद सरकार के सत्ता में बने रहने और आम चुनाव को लेकर कड़ी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। सीरिया के विपक्षी दलों ने इस चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भी कहा है कि ये चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थे। गौरतलब है कि सीरिया के राष्ट्रपति चुनाव में मतदान सरकार के नियंत्रण वाले इलाकों और विदेशों में कुछ सीरियाई दूतावासों में करवाए गए। सीरिया सरकार का कहना है कि चुनाव का होना यह दिखाता है कि देश में सब सामान्य है और देश के भीतर और बाहर एक करोड़ अस्सी लाख लोग मतदान में हिस्सा ले सकते हैं। जबकि हकीकत इससे उलट है।

देश के कई इलाकों पर असद सरकार का कोई प्रभाव नहीं है और वहां विद्रोही समूह काबिज हैं। सीरिया में ज्यादातर हिस्सों पर विद्रोहियों, जिहादियों और कुर्दों के नेतृत्व वाली सेनाओं का नियंत्रण है। लाखों लोग सीरिया से पलायन करके तुर्की समेत यूरोप के कई देशों में चले गए है। लाखों लोग तंबुओं में रहने को मजबूर है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इस लड़ाई में अब तक चार लाख लोग मारे जा चुके हैं। 2011 में राजनीतिक अस्थिरता और विद्रोही समूहों के आपसी संघर्षों के चलते करीब आधी आबादी को मजबूरन देश छोड़ना पड़ा था। इस समय देश की नब्बे फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे रह रही है और लोग भुखमरी का सामना करने को मजबूर हैं।

सीरिया का संकट राजनीतिक समस्या के साथ सामरिक, कूटनीतिक और मानवीय संकट का भी है। 2011 के बाद इस देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने से बड़े क्षेत्र में इस्लामिक स्टेट (आइएस) ने कब्जा जमा लिया था। इसके बाद यहां लंबे समय तक खून खराबे का दौर चला। 2019 में अमेरिका ने दावा किया था कि सीरिया से आइएस को खदेड़ दिया गया है। लेकिन आइएस के लड़ाके अब भी विभिन्न क्षेत्रों में छिपे हैं और राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में उनका समांतर शासन स्थापित करने का खतरा बरकरार है।

ऐसे में सीरिया का भविष्य चुनौतीपूर्ण दिखाई देता है। उधर, तुर्की नाटो का सहयोग लेकर असद को सीरिया में सत्ता से हटाना चाहता है और वह इसके लिए वह यूरोपीय संघ पर दबाव बना रहा है। सीरिया में कई देशों की सेना मौजूद है और सबके सामरिक और आर्थिक हित होने से यहां युद्ध की स्थिति गंभीर होती चली गई। 2013 में अलकायदा से अलग होकर आइएस अस्तित्व में आया और इससे मध्यपूर्व में संघर्ष का एक नया सिलसिला शुरू हो गया था। आइएस ने ईसाइयों और उदार मुसलिमों के विरुद्द जेहाद की घोषणा कर मध्यपूर्व के राजनीतिक संघर्ष की दिशा बदल दी। उसने इस इलाके के तेल कुओं पर कब्जा कर महाशक्तियों को चुनौती पेश कर दी। इसके बाद पश्चिमी देशों, अमेरिका, रूस, तुर्की जैसे देशों ने आइएस को मिल कर खत्म करने में अपनी भूमिका निभाई।

सीरिया में शांति स्थापित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 2012 में हुए जेनेवा समझौते को लागू करने की बात कही है, जिसके अनुसार सबकी सहमति से एक अस्थायी गवर्निंग बॉडी बनाई जाएगी। इसके निकाय के माध्यम से देश का संचालन सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन इस दिशा में जमीन पर कोई प्रगति नजर नहीं आती है। इस समय सीरिया में कुर्द और सीरियन डेमोक्रेटिक फोर्सेज, कुर्दिश डेमोक्रेटिक यूनियन पार्टी और कुर्दिश पीपुल्स प्रोटेक्शन यूनिट्स अलग कुर्दिस्तान के लिए संघर्ष कर रही हैं।

इन्हें यूरोप और अमेरिका का समर्थन मिलता रहा है, लेकिन तुर्की इसके खिलाफ है। तुर्की समर्थित जेएफएस के लड़ाके सीरिया-तुर्की सीमा पर डटे हैं। सीरिया में आइएस का खतरा बरकरार है और सीरिया की कथित सरकारी सेना असद को मजबूत करने के लिए लड़ रही है। असल में सीरिया को एक राष्ट्र के तौर पर बचाए रखने के लिए विभिन्न राजनीतिक, भाषाई, जातीय, धार्मिक एकजुटता और सर्वसम्मत सरकार की जरूरत है। लेकिन इनके बीच तालमेल को लेकर न तो वैश्विक समुदाय ईमानदार है और न ही बशर-अल-असद ऐसी कोई कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। इसका खमियाजा सीरिया के आम लोग नाउम्मीद और बेबस होकर भोग रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *