सुनील दत्त की डेथ एनिवर्सरी: ‘रेशमा और शेरा’ की मेकिंग के दौरान भारी कर्ज में डूब गए थे सुनील दत्त, गिरवी रखना पड़ा घर, बिक गईं कारें और लोग मारने लगे थे ताने

सुनील दत्त की डेथ एनिवर्सरी: ‘रेशमा और शेरा’ की मेकिंग के दौरान भारी कर्ज में डूब गए थे सुनील दत्त, गिरवी रखना पड़ा घर, बिक गईं कारें और लोग मारने लगे थे ताने

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गुजरे जमाने के एक्टर और पॉलिटिशियन दिवंगत सुनील दत्त का आज डेथ एनिवर्सरी है। 25 मई,2005 को उनका निधन हो गया था। 6 जून 1929 को झेलम, पाकिस्तान में जन्मे सुनील एक्टर के साथ-साथ डायरेक्टर और प्रोड्यूसर भी थे। उन्होंने अपने बैनर अजंता आर्ट्स के तले ‘यादें’ (1964), ‘मन का मीत’ (1968) और ‘रेशमा और शेरा’ (1971) जैसी फिल्में बनाईं।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि ‘रेशमा और शेरा’ ने दत्त साहब को कंगाल कर दिया था। उनकी स्थिति यह हो गई थी कि वो आम लोगों तरह बसों में धक्के खाते थे और लोग उन्हें ताने तक मारने लगे थे। यह बात अलग है कि फिल्म ने तीन नेशनल अवॉर्ड (बेस्ट एक्ट्रेस, बेस्ट म्यूजिक और बेस्ट सिनेमैटोग्राफी) अपने नाम किए थे।

सुनील दत्त पर हो गया था 60 लाख का कर्ज

सुनील दत्त ने जब फिल्म ‘रेशमा और शेरा’ अनाउंस की तो उनकी प्लानिंग थी कि वे इसे 15 दिन के अंदर राजस्थान में शूट करेंगे। एस. सुखदेव इसे डायरेक्ट करने वाले थे और सुनील दत्त-वहीदा रहमान का लीड रोल था। विनोद खान, राखी गुलजार और अमिताभ बच्चन का भी फिल्म में अहम रोल था। लीड एक्टर्स समेत फिल्म की यूनिट के सभी 100 लोग जैसलमेर के करीब पोचिना गांव में टेंट में रहे।

फिल्म का ज्यादातर हिस्सा शूट हो चुका था। लेकिन इसी दौरान सुनील दत्त ने इसके रशेस देखे, जो उन्हें पसंद नहीं आए। इसके बाद उन्होंने एस. सुखदेव को हटाकर खुद डायरेक्शन का जिम्मा हाथ में लिया और पूरी फिल्म दोबारा शूट की। जहां इसकी शूटिंग 15 दिन में पूरी होनी थी। वहां इसमें दो महीने का वक्त लग गया। सुनील दत्त ने एक इंटरव्यू में कहा था,’जब तक फिल्म पूरी हुई, तब तक मुझ पर 60 लाख रुपए का कर्ज हो चुका था। इसके अलावा, मैं एक्टर के तौर पर पांच फिल्में भी ठुकरा चुका था।’

जब फिल्म फ्लॉप हुई तो बकायादार सुनील दत्त के पास अपना पैसा मांगने आने लगे। सुनील ने एक बार बताया था, ‘मैं 42 साल का हो चुका था और तीन बच्चों का पिता था। पैसे मेरे पास थे नहीं। मेरी 7 में से 6 कार बिक चुकी थीं। सिर्फ एक बचाई थी, जो बेटियों को स्कूल छोड़ने और वापस लाने के काम आती थी। मेरा घर गिरवी रखा हुआ था। मैंने बस से आना-जाना शुरू कर दिया था। तब लोग ताने मारते हुए कहते थे- क्यों सुनील दत्त, सब खत्म हो गया तेरा? अभी बस में जाना शुरू कर दिया? इस बुरे दौर में घर के अंदर मौजूद नरगिस का प्रिव्यू थिएटर काम आया, जो उन्होंने कुछ वक्त पहले बनाया था। इसमें फिल्ममेकर्स को उनकी फिल्मों के प्रिव्यू और डबिंग के लिए बुलाया जाने लगा।

किस्मत ने फिर मारी पलटी
सुनील दत्त के लिए दो साल बहुत मुश्किल भरे रहे। लेकिन इसके बाद उनकी किस्मत एक बार फिर जागी। उन्होंने ‘हीरा’ (1973), ‘गीता मेरा नाम’ (1974), ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ (1974) और ‘नहले पर दहला’ (1976) जैसी कई फिल्मों में काम किया, जो बॉक्सऑफिस पर खूब चलीं।

‘रेशमा और शेरा’ के जरिए संजय दत्त ने भी पहली बार बड़े पर्दे पर कदम रखा था। उस वक्त वो सिर्फ 12 साल के थे। दरअसल, संजू अपने स्कूल की छुट्टियों में घर आए थे। इसी दौरान वो राजस्थान पहुंचे, जहां ‘रेशमा और शेरा’ की शूटिंग चल रही थी। तब सुनील दत्त ने संजू से पूछा कि क्या वो फिल्म में काम करेंगे? संजू तैयार हो गए और सुनील दत्त ने उन्हें फिल्म की कव्वाली ‘जालिम मेरी शराब में ये क्या मिला दिया’ में मुख्य कव्वाल सुधीर लूथरा के साथ बिठा दिया। सुनील को संजू की परफॉर्मेंस बहुत पसंद आई और उन्होंने उन्हें चमेली जान बुलाना शुरू कर दिया। जब वे पत्र लिखते थे तो कई बार बेटे के लिए डियर चमेली जान शब्द का इस्तेमाल किया करते थे।

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